Correct
Solution (d)
हाल ही में राष्ट्रीय जांँच एजेंसी (National Investigation Agency-NIA) ने बॉम्बे सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ अपील दायर की गई है जिसमे वकील-कार्यकर्त्ता सुधा भारद्वाज को डिफॉल्ट/वैधानिक जमानत (Statutory Bail) दी गई थी।
जमानत कानूनी हिरासत में रखे गए व्यक्ति की सशर्त/अनंतिम रिहाई है (ऐसे मामलों में जिन पर अभी न्यायालय द्वारा निर्णय दिया जाना बाकि हो) जिसमें उस व्यक्ति द्वारा आवश्यकता पड़ने पर अदालत में पेश होने का वादा किया जाता है।
कानूनी स्रोत: यह ज़मानत का अधिकार है जो तब प्राप्त होता है जब पुलिस न्यायिक हिरासत में लिये किसी व्यक्ति के संबंध में एक निर्दिष्ट अवधि के भीतर जांँच पूरी करने में विफल रहती है।
इसे वैधानिक जमानत के रूप में भी जाना जाता है।
यह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167(2) में निहित है।
सर्वोच्च न्यायालय का फैसला: वर्ष 2020 में बिक्रमजीत सिंह मामले , में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा देखा गया कि आरोपी को ‘डिफ़ॉल्ट जमानत’ का एक अपरिहार्य अधिकार प्राप्त है, यदि उसके द्वारा किसी अपराध की जांच के लिये अधिकतम अवधि समाप्त होने के बाद और चार्जशीट दायर करने से पहले आवेदन किया करता है।
CrPC की धारा 167 (2) के तहत डिफ़ॉल्ट जमानत का अधिकार, न केवल एक वैधानिक अधिकार, बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का हिस्सा भी है।
अंतर्निहित सिद्धांत: सामान्य तौर पर, जांँच एजेंसी की चूक पर जमानत के अधिकार को ‘अपरिहार्य अधिकार’ माना जाता है, लेकिन उचित समय पर इसका लाभ उठाया जाना चाहिये।
डिफॉल्ट बेल एक अधिकार है जिसमें अपराध की प्रकृति को बेल का आधार न माना जाता है।
इसकी निर्धारित अवधि जिसके भीतर आरोप पत्र दायर किया जाना है, उस दिन से शुरू होती है तथा जब आरोपी को पहली बार रिमांड पर लिया जाता है तब तक होती है।
CrPC की धारा 173 के तहत, पुलिस अधिकारी किसी अपराध की आवश्यक जांँच पूरी होने के बाद रिपोर्ट दर्ज़ करने के लिये बाध्य है। इस रिपोर्ट को आम बोलचाल की भाषा में चार्जशीट (Charge Sheet) कहा जाता है।
समय अवधि: डिफ़ॉल्ट बेल/जमानत का मुद्दा वहाँ उठता है जहांँ पुलिस के लिये 24 घंटे में जांँच पूरी करना संभव नहीं है, पुलिस संदिग्ध को अदालत में पेश करती है और पुलिस न्यायिक हिरासत के लिये आदेश मांँगती है।
अधिकांश अपराधों के लिये, पुलिस के पास जांँच पूरी करने और न्यायालय के समक्ष अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने हेतु 60 दिनों का समय होता है।
हालांँकि जहांँ अपराध में मौत की सजा या आजीवन कारावास, या कम से कम 10 साल की जेल की सजा होती है, वहांँ यह अवधि 90 दिन है।
दूसरे शब्दों में एक मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति की न्यायिक रिमांड के लिये 60-या 90-दिन की सीमा से अधिक अधिकृत नहीं कर सकता है।
इस अवधि के अंत में, यदि जांँच पूरी नहीं होती है, तो न्यायालय उस व्यक्ति को रिहा कर देगी “यदि वह जमानत देने के लिय तैयार है और स्वयं को प्रस्तुत करता है”।
Article Link:
https://www.thehindu.com/news/national/explained-when-can-an-individual-get-statutory-bail/article37846868.ece
Incorrect
Solution (d)
हाल ही में राष्ट्रीय जांँच एजेंसी (National Investigation Agency-NIA) ने बॉम्बे सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ अपील दायर की गई है जिसमे वकील-कार्यकर्त्ता सुधा भारद्वाज को डिफॉल्ट/वैधानिक जमानत (Statutory Bail) दी गई थी।
जमानत कानूनी हिरासत में रखे गए व्यक्ति की सशर्त/अनंतिम रिहाई है (ऐसे मामलों में जिन पर अभी न्यायालय द्वारा निर्णय दिया जाना बाकि हो) जिसमें उस व्यक्ति द्वारा आवश्यकता पड़ने पर अदालत में पेश होने का वादा किया जाता है।
कानूनी स्रोत: यह ज़मानत का अधिकार है जो तब प्राप्त होता है जब पुलिस न्यायिक हिरासत में लिये किसी व्यक्ति के संबंध में एक निर्दिष्ट अवधि के भीतर जांँच पूरी करने में विफल रहती है।
इसे वैधानिक जमानत के रूप में भी जाना जाता है।
यह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167(2) में निहित है।
सर्वोच्च न्यायालय का फैसला: वर्ष 2020 में बिक्रमजीत सिंह मामले , में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा देखा गया कि आरोपी को ‘डिफ़ॉल्ट जमानत’ का एक अपरिहार्य अधिकार प्राप्त है, यदि उसके द्वारा किसी अपराध की जांच के लिये अधिकतम अवधि समाप्त होने के बाद और चार्जशीट दायर करने से पहले आवेदन किया करता है।
CrPC की धारा 167 (2) के तहत डिफ़ॉल्ट जमानत का अधिकार, न केवल एक वैधानिक अधिकार, बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का हिस्सा भी है।
अंतर्निहित सिद्धांत: सामान्य तौर पर, जांँच एजेंसी की चूक पर जमानत के अधिकार को ‘अपरिहार्य अधिकार’ माना जाता है, लेकिन उचित समय पर इसका लाभ उठाया जाना चाहिये।
डिफॉल्ट बेल एक अधिकार है जिसमें अपराध की प्रकृति को बेल का आधार न माना जाता है।
इसकी निर्धारित अवधि जिसके भीतर आरोप पत्र दायर किया जाना है, उस दिन से शुरू होती है तथा जब आरोपी को पहली बार रिमांड पर लिया जाता है तब तक होती है।
CrPC की धारा 173 के तहत, पुलिस अधिकारी किसी अपराध की आवश्यक जांँच पूरी होने के बाद रिपोर्ट दर्ज़ करने के लिये बाध्य है। इस रिपोर्ट को आम बोलचाल की भाषा में चार्जशीट (Charge Sheet) कहा जाता है।
समय अवधि: डिफ़ॉल्ट बेल/जमानत का मुद्दा वहाँ उठता है जहांँ पुलिस के लिये 24 घंटे में जांँच पूरी करना संभव नहीं है, पुलिस संदिग्ध को अदालत में पेश करती है और पुलिस न्यायिक हिरासत के लिये आदेश मांँगती है।
अधिकांश अपराधों के लिये, पुलिस के पास जांँच पूरी करने और न्यायालय के समक्ष अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने हेतु 60 दिनों का समय होता है।
हालांँकि जहांँ अपराध में मौत की सजा या आजीवन कारावास, या कम से कम 10 साल की जेल की सजा होती है, वहांँ यह अवधि 90 दिन है।
दूसरे शब्दों में एक मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति की न्यायिक रिमांड के लिये 60-या 90-दिन की सीमा से अधिक अधिकृत नहीं कर सकता है।
इस अवधि के अंत में, यदि जांँच पूरी नहीं होती है, तो न्यायालय उस व्यक्ति को रिहा कर देगी “यदि वह जमानत देने के लिय तैयार है और स्वयं को प्रस्तुत करता है”।
Article Link:
https://www.thehindu.com/news/national/explained-when-can-an-individual-get-statutory-bail/article37846868.ece